संसार में कैसे रहें - 2

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भाग 1 से आगे लगातार ....
भगवत गीता में अपने कर्तव्य का पालन करना और दूसरे के अधिकारों की रक्षा करने की बात मुख्य रूप से बताई गई है। मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य कल्याणकारी मार्ग पर चलते हुए दूसरों की भलाई करना होना चाहिए।
गीता में लिखा गया है, कि संबंधियों का, कुटुंब का, हमारे पर जो अधिकार है, उसकी बिना किसी प्रकार के इच्छा के, बिना किसी दबाव के, रक्षा करनी चाहिए। जिस तरह से भी राजी रहे, सुखी रहें, उनका कल्याण हो, उनका हित हो, वैसे काम करते हुए अपनी बुद्धि, बल, योग्यता आदि को काम में लेना चाहिए।
भगवान की आज्ञा समझ कर बड़ी तत्परता से उनकी सेवा करते रहना चाहिए।
जैसे माता-पिता की जो मांग है आवश्यकता है, वो न्याययुक्त हो, और अपने में उसको पूरा करने की सामर्थ्य हो, तो उसको पूरा जरूर करना चाहिए। परंतु वह हमारे अनुकूल बन जाए ऐसी इच्छा किंचित मात्र भी नहीं रहे चाहिए।
इस प्रकार भाई - भोजाई, स्त्री - पुत्र, नौकर, पड़ोसी आदि सब का हित करना चाहिए। और तो और भगवद गीता में तो अपने घर में रहने वाले पशु और पक्षियों के हितों की रक्षा करने की बात भी कही गई है। भगवत गीता में तो यह भी कहा गया है, कि नुकसान पहुंचाने वाले कीट पतंगे जैसे सांप, बिच्छू, खटमल, मच्छर आदि को भी भगाने के उपाय करने चाहिए। उन्हें मारने का अधिकार हमें नहीं है। परिवार में भौतिक वस्तुओं का उतना ही संग्रह करना चाहिये, जिससे परिवार एवं कुटुंब को सुविधा युक्त जीवन आसानी से दिया जा सके। हमें इतना भी संग्रह नहीं करना चाहिए कि हम किसी दूसरे के हक़ का अपने घर में संग्रह करके रख ले, और वह भूखा सो जाए, जिसका वह हक है। परिवार के साथ साथ कुटुंब, मोहल्ला, गांव, प्रांत, देश आदि की सेवा और प्रत्येक का हक हमें ध्यान में रखना चाहिए।

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आपका ~ indianculture1

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